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फ़िराक़ की माँ कहती थीं कि बचपन की मासूमियत में भी फ़िराक़ इसका इन्तेख़ाब करते थे कि किसकी गोद में जाना है और किससे गुरेज़ करना है। अगर यक़ीन किया जाये तो फ़िराक़ में हुस्न की एक फ़ितरी परख थी जो आगे चल कर इल्मी और अदबी शऊर का ज़रिया बन गयी।
Written by Mohd Aqib
Written by Mohd Aqib
