AUDIOBOOK

About

अब अपनी रूह के छालों का कुछ हिसाब करूँ
मैं चाहता था चिराग़ों को आफ़ताब करूँ

बुतों से मुझको इजाजत अगर कभी मिल जाए
तो शहर भर के ख़ुदाओं को बेनकाब करूँ

उस आदमी को बस एक धुन सवार रहती है
बहुत हसीं है ये दुनिया इसे ख़राब करूँ

ये जिन्दगी जो मुझे कर्जदार करती है
कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ

Related Subjects

Artists