तुम्हारा नन्हा डाकिया जो हर बार चिट्ठियाँ देने के एवज में टॉफियाँ लेता था, अबकी दफा कुछ नहीं बोला. बस चुपके से तुम्हारी दी हुई चिट्ठी आगे कर दी. करीने से सात बार मोड़ कर रबर से बंधी हुई चिट्ठी. सात दफा ! अजीब अंक है यह सात भी. सात वचन, सात आसमान, सात समंदर. तुम्हारा वादा भी तो सात जन्मों का ही था न !